कामिनी की कामुक गाथा (भाग 62)

रामलाल के सेक्स जीवन की कहानी सुनने को मैं बेहद उत्सुक थी। मेरे दिमाग मे रश्मि को लेकर एक खुराफाती ख्यालात उमड़ घुमड़ रहा था। मैं जानती थी कि रामलाल की कहानी ज्यों ज्यों आगे बढ़ेगी, यहां का माहौल गरम होता चला जाएगा और फिर हम सभी वासना के पुतलों के मध्य वासना का तूफान अवश्य उठेगा, जिस तूफान की चपेट से रश्मि अछूती नहीं रहेगी और संभवतः उत्तेजना के आवेग में भीमकाय लिंग वाले अर्धविक्षिप्त रामलाल की शिकार भी बन जाए। अगर ऐसा हुआ तो बड़ा मनोरंजक नजारा देखने को मिलना तय था। खैर देखते हैं आगे क्या होता है, यही सोचती हुई मैंने सबके सामने रामलाल को अपनी रासलीला से रूबरू कराने को प्रेरित किया।

रामलाल को मैंने आश्वस्त किया कि यहां सब अपने हैं, इनके सामने अपनी कहानियों को बताने में झिझकने की कोई आवश्यकता नहीं है। उसने जो कुछ अपने ढंग से बताया, उसे यहां पर उसी तरह पेश कर रही हूं।

उसने कहानी शुरू की, “मैं अपने छोटे भाई के साथ रहता हूं। तेरह साल पहले मेरे भाई की शादी हुई। उस वक्त हमारे मां बाप जिंदा थे। शादी के दो साल के अंदर मां बाप चल बसे। घर में सिर्फ धनश्याम उसकी बीवी सरोज और मैं रहते थे। शादी के बाद चार साल तक उसका कोई बच्चा नहीं हुआ। घनश्याम एक कपड़े की दुकान चलाता है। हर मंगलवार को बाजार बंदी के दिन वह खरीदारी के लिए कलकत्ता चला जाता है। करीब नौ साल पहले वह मंगलवार को सुबह कलकत्ता गया हुआ था। दोपहर को खाने के बाद मैंं आराम करने के लिए अपने कमरे की ओर जा रहा था कि मुझेे बावर्चीखाने से सरोज की चीख सुनाई दी। मैं दौड़ कर जैसे ही बावर्ची खाने में पहुंचा तो देखा कि सरोज जमीन पर गिरी पड़ी थी। मैं चुप खड़ा उसे देख रहा था।

“आह, आप देख क्या रहे हैं? हम फिसल कर गिर पड़े हैं। आह, हम उठ नहीं पा रहे हैं। उठाईए ना।” सरोज दर्द में कराहते हुए बोली। मैं आगे बढ़ कर उसे उठा कर खड़ा करने लगा तो वह कराह कर बोली, “आह, लगता है मेरे पैर में मोच आ गयी है, ओह हम खड़े नहीं हो पा रहे हैं।” मैंने सीधे उसे गोद में उठा लिया और लाकर बिस्तर पर लिटा दिया।

“दर्द ज्यादा है?”

“हां, आह, बहुत दर्द है।”

“मैं क्या कर दूं?”

“वहां टेबल पर मूव है। उसे लाकर दाहिनी एड़ी के जोड़ पर लगा दीजिए ना।” मैं मूव ला कर उसकी एड़ी के जोड़ पर लगाने लगा।

“आह, धीरे धीरे, दर्द हो रहा है।” मैं हल्के हल्के मूव लगाने लगा। करीब पांच मिनट बाद वह बोली, “थोड़ा और ऊपर।” मैं उसकी एड़ी से ऊपर मूव लगाने लगा। मूव लगाने के लिए उसकी साड़ी ऊपर उठा दिया। कुछ देर बाद वह फिर बोली, “और थोड़ा ऊपर।” मैं उसके घुटने के ऊपर तक पहुंच गया। “आह, हां, अब थोड़ा अच्छा लग रहा है। और ऊपर लगाईए ना।” ऐसा करते करते उसकी साड़ी जांघों से होते होते कमर तक उठ गयी थी। मैं मूव की मालिश करता करता उसकी जांघों के जोड़ तक पहुंच गया। बहुत सुंदर टागें थीं उसकी। गोरी गोरी, गोल गोल, केले के थंभों जैसी जांघें बहुत चिकनी थी। पता नहीं क्यों मुझे भी मूव लगाने में बड़ा मजा आ रहा था। साड़ी और पेटीकोट के अंदर उसने कुछ नहीं पहना था। बड़ा आश्चर्य हुआ देखकर कि उसका नुनु नहीं था। पेशाब करने की जगह थोड़ा फूला हुआ चिकना सा पेशाब का रास्ता था। उसके ऊपर काले काले बाल थे। जैसे ही मेरा हाथ वहां पहुंचा, सिसक पड़ी

वह, “आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, ओ्ओ्ओह्ह्ह।” मैं घबरा कर हाथ हटा लिया।

“आह्ह क्या हुआ? रुक क्यों गये जेठ जी?” तड़प कर वह बोली। उसकी आंखें बंद थीं। चेहरा लाल हो चुका था।

“यह, कककक्या है?” मैं चकित था।

“ओह बुद्धू जेठ जी, यह चूत है।” वह बोल पड़ी।

“चूत?”

“हां चूत। कैसा है?”

“बहुत सुंदर।”

“तो चूत की भी मालिश कीजिए ना।” वह जल्दी से बोली। मुझे भी मजा आ रहा था। मैं उसकी चूत की मालिश करने लगा। “आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, करते रहिए, ओह्ह्ह्ह्ह करते रहिए, बड़ा्आ्आ्आ्आ अच्छा लग रहा है।”

उसकी चूत के बीच वाले छेद से चिपचिपा सा कुछ निकल रहा था, यह पेशाब तो नहीं था।

“यह क्या है?”

“यह चूत का रस है बुद्धू जेठ जी, चुदाई के पहले निकलता है।” उसकी सांसें बड़ी तेजी से चल रही थीं।

“चुदाई? यह क्या होता है?” मुझको भी कुछ कुछ हो रहा था। मेरे शरीर में सनसनी हो रही थी। पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ था। अजब तरह का आनंद आ रहा था। मेरे पैजामे के अंदर मेरा नुनु पता नहीं क्यों टाईट हो रहा था। लकड़ी की तरह सखत। मेरे अंडरपैंट के अंदर मेरा नुनु खड़ा हो रहा था। बेचैन हो रहा था, पता नहीं क्यों।

“बुद्धू जेठ जी, आह्हह्ह्ह, कैसे बताएं। औरत और मरद के लंड और चूत का मिलन जी।”

“चूत तो समझ गया, यह लंड क्या होता है?”

“आपके पैजामा के अंदर क्या है? लंड है लंड।”

“यह तो नुनु है।”

“पागल, यह नुनु नहीं, लंड है जेठ जी। आह मेरे बुद्धू, यही लंड मेरी चूत में घुसा कर चुदाई होगा।” वह मेरी नुनू, जिसे लंड बोल रही थी, पजामे के ऊपर से पकड़ कर बोली। “यहां हम चुदने के लिए मरे जा रहे हैं और आप अबतक कपड़े पहने हुए हैं। समझ ही नहीं रहे हैं।” वह पागल हो रही थी।

“लेकिन तेरे पैर में तो मोच है। दर्द नहीं होगा तेरे पैर में?” मैं पूछा।

“अरे पागल, दर्द तो बहाना था। असल में हमें आपको अपनी चूत दिखा कर आपसे चुदवाना है। हमें चोदकर मां बना दीजिए जेठ जी।” बेकरारी से बोली।

“लेकिन मेरा लंड तेरी चूत में घुसेगा कैसे?”

“घुसेगा, पूरा घुसेगा, पहले अपने कपड़े तो उतारिए मां के लौड़े।” वह बड़ी उतावली हो रही थी। मैं भी अपने लंड की सख्ती से परेशान था। मेरे अंडरपैंट के अंदर मेरा लंड दर्द करने लगा था। मैंने जल्दी से अपने कपड़े उतार डाले और पूरा लंगटा हो गया।

“बाआ्आ्आ्आप रे्ए्ए्ए्ए्ए बा्आ्आ्आ्आप, इत्ता बड़ा्आ्आ्आ्आ लंड!” वह मेरे लंड को देख कर डर गयी। आंखें बड़ी बड़ी हो गयी थी उसकी।

“हां, यही तो लंड है मेरा।” मैं अपना टनटनाया लंड दिखाता हुआ बोला। कपड़े से आजाद हो कर मुझे बड़ा अच्छा लग रहा था। मेरा लंड आजाद हो गया था।

“ना बाबा ना। यह तो गधा का लंड है।” घबरा गयी थी वह।

“मैं बोला था ना, तेरी चूत में लंड नहीं घुसेगा।” हालांकि मुझे अब उसकी चूत में लंड डालकर देखने का मन कर रहा था, कैसा लगता है? मुझे लग रहा था कि इससे मेरे लंड की परेशानी शायद कुछ कम होगी। मैं अब तनिक बेसब्र हो रहा था।

“आदमी का लंड घुसता है इसमें, गधे का नहीं।”

“मैं आदमी नहीं हूं क्या?”

“आपके भाई का लंड तो छ: इंच का है, आराम से घुस जाता है, मगर आपका तो दस इंच से भी ज्यादा लंबा है और गधे के लंड जैसा मोटा भी। फट जाएगी हमारी चूत। मर जाएंगे हम। ना बाबा ना।” बिस्तर से उठते हुए बोली।

“न न न न, उठो मत। जरा सा चोदने दे न। पहली बार किसी औरत के चूत को देख कर मेरा लंड खड़ा हुआ है। बहुत बेचैन है मेरा लंड। देखो, दर्द कर रहा है।” मैं बेचैनी से बोल उठा। रहम आ गया उसे मुझ पर।

“तो मैं क्या कर दें हम? डर लग रहा है हमारी चूत के लिए। लाईए हम आपके लंड का पानी निकाल दें।” कहकर मेरा लंड दोनों हाथों से पकड़ ली।

“आह बहुत अच्छा लग रहा है।” मैं बोला। गनगना उठा मैं। वह मेरे लंड को पकड़ कर ऊपर से नीचे तक सहलाने लगी।

“ओह्ह्ह्ह्ह मां्आं्आं्आं, पहली बार इत्ता बड़ा्आ्आ्आ्आ लंड देख रही हूं। आप तो चोद कर मार ही डालिएगा।” वह मेरे लंड को सहलाते हुए बोली। लेकिन अब उसकी आवाज में डर नहीं था। “हम आपसे चुदवा कर मां बनना चाह रही थी मगर……..।”

“मगर?”

“मगर इत्ता बड़ा लंड देखकर हमारी हिम्मत नहीं हो रही है।”

“चोदने से अगर मां बन सकती हो तो डर काहे रही हो?” मुझे अब चोदने का बड़ा मन कर रहा था। पहली बार मुझे यह मौका मिल रहा है और यह डर रही है, करूं तो क्या करूं। लेकिन उसके सहलाने से मेरे लंड को बड़ा सुकून मिल रहा था। सोच रहा था कि सहलाने से इतना अच्छा लग रहा है तो चोदने में कितना अच्छा लगेगा? “थोड़ा हिम्मत करके एक बार मुझसे चुदवा ही लो न।”

“हटिए जी, बड़े जालिम हैं आप। मार डालने का इरादा है क्या?” उसकी आवाज तनिक धीमी हो गयी थी। उसकी सांसें धौंकनी की तरह चल रही थी। मेरे लंड को सहलाते सहलाते वह लाल हो गयी थी। दो तीन मिनट बाद उसके मुंह से आवाज निकली, “आह्ह, बड़ा है मगर मस्त है, आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, कोशिश करती हूं, मगर धीरे धीरे आराम से चोदिएगा।”

“ठीक है, ठीक है, आराम से चोदुंगा, तुम बताती जाओ, मैं वैसा ही करूंगा।” मैं खुश होकर जल्दी से बोला।

“पहले मेरे कपड़े तो उतारने दे पगले।” फटाफट अपने कपड़े उतार कर पूरी लंगटी हो गयी वह। मैं उसके लंगटे बदन को देख कर अचंभित रह गया, बहुत सुंदर बदन था उसका।

“वाह आपका थन तो बड़ा सुंदर है। बड़ा बड़ा, चिकना, गोल गोल।” मैं उसके थन को छू कर बोला। सखत था उसका थन।

“थन नहीं पागल, चूची। चूचियां हैं मेरी।”

“अच्छा अच्छा, चूचियां हैं। मैंने बचपन में मां का दूध पिया है। दूध निकलता है ना इससे?”

“हां जी हांआंआंआंआंआं, दूध निकलेगा, लेकिन अभी नहीं, बच्चा होने के बाद।”

“ओह, मुझे इनसे खेलने का मन कर रहा है।”

“तो खेलिए ना। मना कौन कर रहा है। आपका भाई भी खेलता है।”

“कैसे?”

“सहलाता है, दबाता है, चूसता है।”

“मैं भी ऐसा ही करूं?”

“हां बाबा हां, बकवास मत कीजिए, जो मर्जी कीजिए, जल्दी कीजिए।” कलप कर बोली। मैं उसकी सखत चूचियों को सहलाने लगा, दबाने लगा। बड़ा मजा आ रहा था मुझे। वह मेरे लंड को सहलाती जा रही थी।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, ओ्ओफ्फ्फ्फ्फ्फ, पागल जेठ जी, हां हां हां हां ऐसा ही ओह्ह्ह्ह्ह, मजा आ रहा है।” वह पगला रही थी। अब मैं मुह लगा कर उसकी चूचियों को चूसने लगा, वाह बड़ा आनंद आ रहा था। कुछ देर चूसने के बाद ही सरोज खुद ब खुद बोल उठी, “चोदिए, आह्ह अब चोद डालिए, अब और बर्दाश्त नहीं हो रहा है आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह।” मेरे लंड की लंबाई और मोटाई से बेपरवाह बोल रही थी वह। मैं भी चोदने को बेकरार था। वह अपने पैर फैला कर चित्त लेटी मेरे लंड को अपनी चूत के छेद के पास खुद ब खुद ले आई और पागलों की तरह कमर उछाल बैठी। मैं समझ गया कि अब मुझे उसकी चूत में लंड घुसाना है। मेरे लंड का सामन वाला हिस्सा उसकी चूत के मुंह पर रख कर धीरे धीरे घुसाने का प्रयास करने रगा, लेकिन बार बार मेरा लंड फिसल कर इधर उधर चला जा रहा था। तंग आ कर सरोज खुद मेरा लंड अपनी चूत के छेद पर टिका कर अपनी कमर दुबारा उछाल बैठी। निशाना सही था, फच्च से मेरे लंड का अगला हिस्सा उसकी चुत के अंदर घुस गया।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह,” दर्द से चीख पड़ी वह। ताव ताव में वह जो कुछ कर बैठी थी वह कितना दर्दनाक होगा, शायद उसे अब पता चला था। लेकिन अब मुझे मंजिल मिल गयी थी। मेरे लंड को रास्ता मिल गया था। मैं मौका गंवाना नहीं चाहता था। उसकी कमर को पकड़ कर एक धक्का लगा दिया।

“ऊं्ऊं्ऊं्ऊं्ऊं्ह्ह्ह्ह्ह्ह हुम्म्म्म्म्म्म।”

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, मर गयी रे्ए्ए्ए्ए्ए्ए।” वह तड़प उठी दर्द के मारे। एक धक्के में ही मेरा लंड उसकी चूत को चीरता हुआ एक तिहाई अंदर चला गया। “छोड़िए, छोड़िए आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, फट्ट्ट्ट्ट्ट गयी मेरी चू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊत।” दर्द के मारे चीख उठी वह। पसीना पसीना हो गयी। लेकिन अब मुझे आनंद आ रहा था। मुझे स्वर्ग जैसा आनंद आ रहा था। मेरा लंड गरम गरम गुफा में समाता जा रहा था। मैं एक और जोर का धक्का लगा दिया। करीब करीब पूरा लंड चला गया अंदर। एक इंच शायद बचा था। “आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह मा्आ्आ्आ्आ्र्र्र्र्र्र डा्आ्आ्आलिएग्ग्ग्गा क्या्आ्आ्आ्आ? ओ्ओफ्फ्फ्फ्फ्फ मां्आं्आं्आं कहां आ फंसी रे्ए्ए्ए्ए्ए्ए।” वह दर्द से तड़प रही थी लेकिन मैं अब जानवर बन चुका था।

“चो्ओ्ओ्ओ्ओ्प्प्प्प्प्प् हर्र्र्र्र्र्र्र्आ्आ्आ्आ्आमजादी। एकदम चो्ओ्ओ्ओ्ओ्प्प्प्प्प्प्।” मैं गुस्से में आ गया। सहम गयी वह मेरा जानवर वाला रुप देखकर। मुझे अब उसके चीखने चिल्लाने से गुस्सा आ रहा था। मेरे आनंद में खलल पड़ते देख मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा था। एक और धक्का मारा और पूरा का पूरा लंड उसकी चूत के अंदर चला गया। वह रो रही थी, सिसक रही थी, उसकी आंखों से आंसू निकल रहा था लेकिन मुझे कोई फर्क नहीं पड़ा। “हो तो गया, घुस तो गया, पूरा लंड तो घुस गया, अब रो काहे रही है हरामजादी।” खूंखार लहजे में मैं बोला।

“आह्ह, निकालिए ना्आ्आ्आ्आ्आ्आ। मेरी चूत को तो फाड़ दिया, अब मेरे बच्चादानी को भी फाड़ दीजिएगा क्या्आ्आ्आ्आ?” वह रोते रोते बोली। थोड़ा डर गया मैं। हड़बड़ा कर पूरा लंड बाहर निकाल लिया, लेकिन मुझे कुछ अच्छा नहीं लगा। फिर घुसाने की बड़ी इच्छा हो रही थी। उधर सरोज को भी पता नहीं क्या हुआ, शायद पूरा लंड बाहर निकालने से उसे भी कुछ अच्छा नहीं लगा, अपने आप कमर उचका कर थोड़ा लंड अंदर ले बैठी। “पूरा निकाल दिया, ओह्ह्ह्ह्ह, अंदर पूरा खाली खाली लग रहा है, ओह यह हमें क्या हो रहा है, लंड अंदर तो तकलीफ, लंड बाहर तो तकलीफ। क्या कर दिया जेठजी आपने?”

“अब मैं क्या करूं? ऐसी चुदाई होती है क्या?” खीझ उठा मैं।

“डालिए, डाल ही दीजिए, अब रहा क्या? फट तो गयी हमारी चूत। चलिए, चोदिए। लंड धीरे धीरे अंदर डालिए, फिर बाहर निकालिए। आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह हां हां ऐसा ही ऐसा ही।” उसकी बात सुनकर मैं ऐसा ही करने लगा। धीरे धीरे अंदर घुसाने लगा। “आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, ओ्ओ्ओह्ह्ह, आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, ओ्ओफ्फ्फ्फ्फ्फ, ओह मां्आं्आं्आं, ओह बप्प्आ्आ्आ्आह्ह्ह्, हां हां हां यही है चुदाई, ओह दर्द है मगर मजा है आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, चोदते रहिए जेठ जी।” वह बोल रही थी और मैं उसकी कमर पकड़ कर लंड अ़दर बाहर करने लगा। उसकी आवाज में दर्द भी था और खुशी भी थी। मुझे बड़ा आनंद आ रहा था। कितनी टाईट थी उसकी चूत। उफ्फ्फ्फ्फ्फ बता नहीं सकता। चोदने में इतना आनंद। एक औरत की चूत में इतना स्वर्गीय सुख। धीरे धीरे मैं जोश के मारे उसकी कमर पकड़ कर दनादन चोदने में डूब गया। अब सरोज भी अपने दोनों पैरों को मेरी कमर पर लपेट कर बड़े मदे से मेरा लंड खा रही थी।

“आह्ह हमार राजा, ओह हमार सैंया, ओह हमार बलमा, आह हमार भतार, आह हमारे प्यारे चोदक्कड़ जेठ जी, हाय हमारे प्राणनाथ, आह ओह चोदिए राजाजी, ओह ओह स्वरग देखा रहे हैं। इस्स्स्स्स्स्स्स इस्स्स्स्स्स्स्स।” उधर वह पागलों की तरह मुझसे चिपकी चुदी जा रही थी और मैं आनंद मगन भचाभच चोदे जा रहा था। धमाधम, धक्के पे धक्का, घपाघप। करीब पंद्रह मिनट बाद सरोज थरथर कांपती हुई मुझ से चिपक गयी। “ओ्ओ्ओह्ह्ह ओ्ओ्ओह्ह्ह हम गये, ओह हम झड़े रे झड़े मेरे जे्ए्ए्ए्ए्ए्ठ्ठ्ठ्ठ जी्ई्ई्ई्ई्।” और उसका पूरा शरीर ढीला पड़ने लगा लेकिन मैंने उसे छोड़ा नहीं, चोदता रहा चोदता रहा, फचाफच, चटाचट, भचाभच। आधे घंटे तक मैं उसे रगड़ रगड़ कर चोदा और तब मेरा शरीर थरथराने लगा। मेरा लंड और बड़ा होने लगा, ऐसा मुझे लगा और तभी मेरे लंड से कुछ निकलने लगा। उसी समय सरोज भी फिर से मेरे बदन से चिपट गयी।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह यह क्या हो रहा्आ्आ्आ्आ्आ है?” मैं स्वरग सुख में डूब कर बोला।

“ओ्ओफ्फ्फ्फ्फ्फ पगले, आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, आपके लंड का रस निकल रहा है ओ्ओफ्फ्फ्फ्फ्फ मैं भी ओह मैं भी झड़ रही हूं। मां बना दे ओह बलमा, मां बना दे हमें हरामी जेठ जी, हमा्आ्आ्आ्आ्आरे्ए्ए्ए्ए पिया, मां बना दे मां बना दे।” वह थरथराती हुई बोली। हम करीब तीन मिनट तक उसी तरह चिपटे रहे फिर हांफते हुए पूरे संतुष्ट, ढीले पड़ गये। ऐसा लग रहा था मानो मेरा बदन हल्का हो कर हवा में उड़ रहा हो। “ओह्ह्ह्ह्ह राजा, बहुत सुख दिया आपने हमें।” मुझे चूम कर बोली वह। उस दिन मैंने तीन बार चोदा और जम कर चोदा। सरोज भी बहुत खुश हुई, जबकि उसकी चूत फैल कर गुफा बन गयी थी। फूल गयी थी। मेरे लंड पर खून ही खून लिथड़ा हुआ था लेकिन फिर भी सरोज खुश थी। वह मेरी पहली चुदाई थी, बड़ा ही सुखद, आनंददायक अनुभव था। फिर तो मुझे चुदाई का चस्का ही लग गया। औरत देखी नहीं कि लंड अपने आप खड़ा हो जाता है, जैसा कि अभी रश्मि जी को देख कर हो रहा है।”

खुल्लमखुल्ला ऐसी बात सुन कर रश्मि हकबका गयी। उसकी कहानी हम बड़ी तन्मयता के साथ सुन रहे थे। ऐसी उत्तेजक कहानी सुनकर सब उत्तेजित भी हो गये थे। रश्मि की तो कनपट्टी लाल हो गयी। हम सभी मुस्कुरा कर रश्मि को देख रहे थे। “हट, यह क्या बोल रहे हैं आप?” रश्मि सुर्ख चेहरे के साथ बोली, लेकिन उसकी आवाज में रामलाल के कथन के प्रति, जिसमें छिपा हुआ प्रस्ताव भी था, कोई खास विरोध भी नहीं था।

मैं मुस्कुराते हुए बोली, “वाह मेरी लाड़ो, प्रतिवाद तो है मगर इनकार नहीं। देखो तो, कैसी लाल भभूका हो रही है। रामलाल जी, लगता है आपका जादू इसपर भी चल गया। खैर जो होगा, वो तो बाद की बात है, फिलहाल तो अपनी कहानी बोलिए।”

“नहीं, बाद में। रश्मि मैडम को चोदने का मन कर रहा है।” रामलाल सीधा मुद्दे पर आया।

“धत, ना बाबा ना। इस पागल से तो ना।” रश्मि बोली जरूर लेकिन उसका चेहरा चुगली कर रहा था कि वह झूठ बोल रही है।

“ठीक है बाबा ठीक है। रामलाल जी आगे देखा जाय क्या होता है। आप जल्दी से अपनी कहानी पूरी कीजिए।” मैं जानती थी कि तवा गरम है। केवल रामलाल को सिग्नल मिलने की देर है, टूट ही पड़ता वह रश्मि पर।

रामलाल अनमने ढंग से आगे बताने लगा, “उस दिन के बाद जब भी हमें मौका मिलता हम चुदाई में लग जाते थे। करीब दो महीने बाद ही पता चल गया कि सरोज मां बनने वाली है। सब बड़े खुश थे। घनश्याम तो सबसे अधिक खुश था। सरोज मुझसे बोली, “यह बात किसी को पता नहीं लगना चाहिए कि हम आपसे गर्भवती हुए हैं, नहीं तो बवाल हो जावेगा।”

“ठीक है मेरी रानी ठीक है। नहीं बोलुंगा, किसी से कुछ नहीं बोलूंगा।” मैं बोल उठा।

……..इसके बाद की कहानी अगले भाग में। तबतक के लिए मुझे आज्ञा दीजिए।

रजनी

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Rajni4u

मैं एक 51 साल की विधवा शिक्षिका हूँ। मैं कामोत्तेजक कहानियां पढ़ना, दोस्ती करना और दोस्तों से किसी भी प्रकार की चैटिंग करना पसंद करती हूं। मेरी रुचि संगीत में भी है। फिलहाल मैं अपनी कामुक भावनाओं को कहानियों के माध्यम से लोगों के सम्मुख प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही हूं।